अरण्ड

  • 21 किस्मों व 14 संकरों को विकसित करके जारी किया गया
  • कृषि आर्थिक व जैविक प्रतिबल के प्रतिरोध के लिए अनेक जननद्रव्यों का मूल्यांकन किया गया व उनकी पहचान की गई|
  •  क्षेत्र्  विशिष्ट लाभदायक फसल प्रणालियों की पहचान की गई|
  • क्षेत्र्  विशिष्ट बुआई की आदर्श स्थितियों, उर्वरक की खुराकों, सिंचाई अनुसूची व अन्य सस्यविज्ञानी विधियों की अनुशंसा की गई|
  • मंदौर में अरण्ड में राजस्थान की सिंचित स्थितियों के अंतर्गत जिप्सम के माध्यम से 20 कि.ग्रा./है. गंधक का उपयोग करने की उन स्थानों पर सिफारिश की गई है जहां मिट्रटी में गंधक का स्तर निम्न या मध्यम है| इससे उच्च बीज उपज और लाभ लिया जा सकता है|
  • गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र् (जूनागढ़) में अरण्ड को 1 प्रतिशत सोडियम क्लोराइड के साथ 3 घंटे तक बीज की प्राइमिंग करके बोना लाभदायक सिद्घ हो सकता है क्योंकि इससे उच्च बीज उपज मिलने के साथ-साथ अधिक लाभ प्राप्त होता है|
  • जहां उपलब्ध मिट्रटी में गंधक के स्तर में कमी है या उसका स्तर मध्यम है वहां उच्च बीज उपज व लाभ प्राप्त करने के लिए राजस्थान और गुजरात में सिंचित स्थितियों के अंतर्गत अरण्ड में जिप्सम के माध्यम से 20 कि.ग्रा./ है. की दर से गंधक का उपयोग किया जाना चाहिए|
  • सुनिश्चित सिंचाई की अवस्था में उत्तर गुजरात में अरण्ड+ मूंग(1:1) अंतर-फसल प्रणाली के अंतर्गत दोनों फसलों की एक साथ बुआई की जानी चाहिए|
  • आंध्रप्रदेश में पौधे से पत्ती गिराने वाले कीट तथा खोल बेधक को नियंत्रित करने के लिए अरण्ड की फसल में स्पिनोसैड 0.018 प्रतिशत या इंडोक्साकार्ब 0.015 प्रतिशत का छिड़काव किया जाना चाहिए तथा तमिलनाडु में इन कीटों के नियंत्र्ण के लिए प्रोफेनफॉस 0.05 प्रति शत का छिड़काव किया जाना चाहिए|
  • मंदौर में उच्च निवल लाभ (56540/है.और54974/है.) तथा लाभ लागत अनुपात (3.58 और3.44) प्राप्त करने तथा अरण्ड की उपज पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ने के लिए अरण्ड की सामान्य रोपी गई फसल में मूंग की फसल की दो कतारें लगाई जा सकती हैं|
  • अरण्ड में वायरवर्म के प्रभावी व आर्थिक प्रबंध के लिए कारबेरिल 50 डब्ल्यू पी या कार्बोसल्फॉन 27.18 डीएस या इमिडोक्लोपि्रड 70 डब्ल्यूएस का 5 ग्रा./कि.ग्रा.बीज की दर से या थियामेथॉक्सेम 70 डब्ल्यूएस का 3 ग्रा./कि .ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करने की अनुशंसा की जाती है| ऐसा विशेष रूप से गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र् में(जूनागढ़) विशेष लाभदायक सिद्घ हो सकता है
  • गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र्(जूनागढ़) में अरण्ड में थि्रप्स के प्रभावी व आर्थिक नियंत्र्ण के लिए एसेफेट 0.05 प्रतिशत या डाइमेथोएट 0.03 प्रतिशत या एंडोसल्फान 0.07 प्रतिशत के छिड़काव की अनुशंसा की जाती है|
  • पिछले 5 वर्षों के दौरान 441.9 क्विंटल प्रजनक बीज उत्पन्न किया गया तथा 1309 अग्र पंक्ति प्रदर्शन या एफएलडी आयोजित किए गए|


सूरजमुखी

  • 18 किस्मों व 31 संकरों को विकसित करके जारी किया गया|
  • कृषि आर्थिक गुणों व जैविक प्रतिबल प्रतिरोध जैसे गुण के लिए अनेक जननद्रव्य प्रविष्टियों का मूल्यांकन करते हुए उनकी पहचान की गई|
  • क्षेत्र विशिष्ट लाभप्रद फसल प्रणालियों की पहचान की गई|
  • क्षेत्र विशिष्ट बुआई की आदर्श स्थिति, उर्वरकों की खुराकों, सिंचाई अनुसूची व अन्य सस्यविज्ञानी विधियों की अनुशंसा की गई|
  • अधिकांश केन्द्रों में सूरजमुखी का उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए घने पौधां की छंटाई करना, उर्वरकों का संतुलित उपयोग तथा फसल के खरपतवारों का निकालना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य हैं|
  • कोयम्बत्तूर और रायचुर में मूंगफली + सूरजमुखी (3:1) फसल प्रणाली में क्षेत्र् के आधार पर मूंगफली में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की अनुशंसित खुराक का उपयोग करें तथा फास्फोरस और पोटाश की अनुशंसित मात्र व नाइट्रोजन की अनुशंसित खुराक की 50 प्रतिशत मात्र का उपयोग सूरजमुखी की फसल में उसके आधार पर या उस पर छिड़क कर उपयोग में लाएं ताकि उच्च उत्पादन और लाभ लिया जा सके|
  • कोयम्बत्तूर और धोली में उच्च लाभ प्राप्त करने के लिए व नाइट्रोजन की 50 प्रतिशत तक बचत करने के लिए इसकी अनुशंसित खुराक की 50 प्रतिशत मात्र (अर्थात्र30 कि.ग्रा.नाइट्रोजन/हैक्टर) का उपयोग करने के साथ-साथ बीज में एज़ोस्पिरिलम तथा एज़ोटोबैक्टर नामक जैव उर्वरकों का टीका लगाना फायदेमंद सिद्घ होता है|
  • आंध्रप्रदेश तथा महाराष्ट्र के मराठवाड़ा  क्षेत्र् में सूरजमुखी की परवर्ती फसल के रूप में रबी में ज्वार की फसल लेने से बचें
  • महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र्में खरीफ फलीदार फसलों जैसे मूंग या उड़द की उन्नत परवर्ती फसल उगाकर रबी में सूरजमुखी की उत्पादकता भी बढ़ाई जा सकती है|
  • सूरजमुखी के लिए परवर्ती खरीफ की फलीदार फसलों में सिंचित स्थितियों के अंतर्गत प्रतिहैक्टर 60 कि. ग्रा. नाइट्रोजन का उपयोग करना चाहिए, ताकि बीज की सर्वोपयुक्त उपज ली जासके|
  • कर्नाटक के उत्तरी भाग में रबी के मौसम में सूरजमुखी की उत्पादकता तब बढ़ाई जा सकती है जब परवर्ती खरीफ की फसल में लोबिया की खेती की जाए|
  • दक्षिण कर्नाटक में सूरजमुखी की फसल में पौधे से पत्ती गिराने वाले कीटों नामत: स्पेडोप्टेरा, ट्राइकोप्लूसिया के नियंत्र्ण के लिए प्रोफेनफॉस का 0.05 प्रतिशत की दर से या क्लोरपाइरीफॉस का 0.05 प्रतिशत की दर से उपयोग किया जाना चाहिए|
  • महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र्में पत्ती गिराने वाले कीटों तथा शीर्ष वेधक के प्रबंध के लिए प्रोफेनफॉस का 0.05 प्रतिशत की दर से या क्लोरपाइरीफॉस का 0.05 प्रतिशत की दर से या एंडोसल्फान का 0.07 प्रतिशत की दर से उपयोग किया जाना चाहिए|
  • पिछले 4 वर्षों के दौरान 206.81 क्विंटल प्रजनन बीज उत्पन्न किया गया और 491 अग्र पंक्ति प्रदर्शन या एफएलडी आयोजित किए गए| 

कुसुम

  • 28 किस्मों व 5 संकरों को विकसित करके जारी किया गया|
  • कृषि-आर्थिक व जैविक प्रतिबल प्रतिरोध संबंधी गुणों के लिए अनेक जननद्रव्यों का मूल्यंाकन किया गया व उनकी पहचान की गई|
  • क्षेत्र्   विशिष्ट लाभप्रद फसल प्रणालियों की पहचान की गई|
  • क्षेत्र्   विशिष्ट बुवाई की आदर्श स्थिति, उर्वरकों की खुराक, सिंचाई अनुसूची तथा खेती की अन्य सस्यविज्ञानी विधियों की अनुशंसा की गई|
  • आंध्रप्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र (तंदुर) में बारानी स्थितियों के अंतर्गत चना+ कुसुम (3:1) और धनिया+ कुसुम(3:1) अंतर फसल प्रणाली के लिए मुख्य फसल (चना/धनिया) में उर्वरकों की 100 प्रतिशत अनुशंसित खुराक इस्तेमाल की जानी चाहिए तथा प्रणाली में प्रत्येक फसल द्वारा घेरे गए क्षेत्र के आधार पर सूरजमुखी की फसल में उर्वरकों की अनुशंसित खुराक का 50 प्रतिशत भाग दिया जाना चाहिए, ताकि उच्चतर उपज व लाभ प्राप्त हो सके|
  • महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र (अकोला) में घने पौधों की छंटाई करते हुए खरपतवारों का नियंत्र्ण करना बहुत महत्वपूर्ण है| क्योंकि इस से बारानी स्थितियों के अंतर्गत कुसुम की फसल की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है|
  • महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र् (अकोला) में बारानी स्थितियों के अंतर्गत एज़ोटोबैक्टर या एज़ोस्पिरिलम अथवा इन दोनों को मिलाकर बीजोपचार करना प्रभावी सिद्घ होता है और इस से नाइट्रोजन की अनुशंसित खुराक की 50 प्रतिशत मात्र अर्थात् त्प्रति हैक्टर12.5 कि.ग्रा. नाइट्रोजन उर्वरक की बचत की जा सकती है|
  • महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र (अकोला) में नमी की कमी की स्थितियों के अंतर्गत फसल में फूल निकलना आरंभ होने की अवस्था में 500 पीपीएम की दर से साइकोसैल का उपयोग करने पर या 50 प्रतिशत पुष्पन होने पर इसी दर से इस रसायन का उपयोग करने से कुसुम की बीज उपज में वृद्घि हो सकती है|
  • महाराष्ट्र के पानी की कमी वाले क्षेत्र् (सोलापुर) में फसल प्रणाली से रिकॉर्ड उच्चतर लाभ प्राप्त करने के लिए चना और सूरजमुखी दोनों में फास्फोरस की अनुशंसित खुराक की 100 प्रतिशत मात्र का उपयोग करना जरूरी है|
  • महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में सोयाबीन के लिए फास्फोरस उर्वरक के उपयोग को कम करने के लिए इसके स्थान पर बीजों का पीएसबी से बीजोपचार करते हुए 5 टन प्रति हैक्टर की दर से घूरे की खाद या एफवाईएम का उपयोग किया जाना चाहिए| इससे कुसुम की फसल में फास्फोरस की अनुशंसित खुराक की शत-प्रतिशत बचत होती है और प्रणाली उत्पादकता पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है|
  • कुसुम की फसल के माहुओं के नियंत्र्ण के लिए15 दिनों के अंतराल पर दो बार थियामैथोक्सैम (25 डब्ल्यूजी) 0.005 प्रतिशत या इमिडोक्लोपि्रड(17.8 प्रतिशत) 0.0045 प्रतिशत की दर से उपयोग करना मध्यप्रदेश के मालवा पठार में बहुत प्रभावी और आर्थिक पाया गया|
  • 368.9 क्विंटल प्रजनक बीज उत्पन्न किया गया तथा 922 अग्र पंक्ति प्रदर्शन या एफएलडी आयोजित किए गए|