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अरण्ड

1. अरण्ड की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु उपयुक्त है?

मूल रूप से अरण्ड को सूखा सह सकने वाली फसल माना जाता है तथा यह उन क्षेत्रों में अच्छी उगती है जो शुष्क तथा गर्म हैं और जहां 50-75 सें.मी. वर्षा होती है| भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में फसल की वानस्पतिक बढ़वार अधिक हो जाती है और यह बहुवार्षिक हो जाती है| फसल1200 से 2100 मी. की ऊंचाइयों पर भी अच्छी उगती है| इसके लिए हल्के अधिक तापमान (20-260से.) तथा कम आर्द्रता की आवश्यकता होती है और इन स्थितियों में इसकी अच्छी उपज मिलती है|  

2. भारत में अरण्ड की खेती कहां की जाती है?

भारत में अरण्ड की खेती मुख्यत: गुजरात और आंध्रप्रदेश में की जाती है| कुछ हद तक यह राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और ओडिशा में भी उगाई जा सकती है| मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार व हरियाणा जैसे राज्यों में भी अरण्ड को उगाने की क्षमता है| गुजरात तथा राजस्थान में यह सिंचित स्थितियों के अंतर्गत उगाई जाती है जहां इसकी उच्च उत्पादकता प्राप्त होती है, जबकि आंध्रप्रदेश तथा अन्य राज्यों में यह बारानी स्थितियों के अंतर्गत उगाई जाती है, लेकिन यहां इसकी कम उपज मिलती है |

3. अरण्ड की खेती के लिए किस प्रकार की मिटि्टयां उपयुक्त हैं?
अरण्ड उन सभी मिटि्टयों में अच्छी उगती है जिनमें जल निकासी की अच्छी क्षमता है| यह तटवर्ती भारत में सामान्यत: लाल बलुआ दुमट मिटि्टयों में उगाई जाती है, जबकि उत्तर-पश्चिमी राज्यों में यह हल्की जलोढ़ मिटि्टयों में उगाई जाती है| वे मिटि्टयां जो खाद्य फसलों और वाणिज्यिक फसलों की खेती के लिए उपयुक्त नहीं हैं उनमें हमारे देश में अक्सर अरण्ड की खेती की जाती है| इस फसल पर अच्छे प्रबंध तथा बेहतर निवेशों की अच्छी प्रतिकि्या होती है|

4. अरण्ड की खेती के लिए खेत किस प्रकार तैयार किया जाना चाहिए?

अरण्ड की खेती के लिए खेतों को मानसून के पूर्व होने वाली वर्षा के तत्काल बाद तैयार किया जाना चाहिए| इसके लिए खेत को ढलान के आर-पार दो बार जोता जाना चाहिए| इसके बाद खरपतवारों को नियंत्रित करने और मिट्टी में नमी को बचाए रखने के लिए तवादार हैरो से दो जुताइयां की जानी चाहिए| यदि मिट्टी में पर्याप्त नमी है तो गर्मी में जुताई करने से नमी संरक्षण के अलावा कीट-नाशकजीवों व रोगों के प्रबंध में भी सहायता मिलती है|

5. अरण्ड की बुआई का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
बुआई का सबसे अच्छा मौसम खरीफ में मानसून आने के तत्काल बाद का है| उपयुक्तम समय आंध्र प्रदेश तथा कुछ अन्य दक्षिणी राज्यों में जून के दूसरे पखवाड़े से शुरू होता है| गुजरात और राजस्थान में बुआई का सबसे अच्छा समय जुलाई का पहला पखवाड़ा है| जैसे-जैसे बुआई में देर होती है, उपज में कमी आती जाती है| रबी मौसम में बुआई के लिए15 सितम्बर से 15 अक्तूबर आदर्श समय है; जबकि ग्रीष्मकालीन फसल के लिए बुआई का उचित समय जनवरी है|

6. एक हैक्टर खेत के लिए कितने बीज की आवश्यकता होती है?

शुष्क भूमि में जुताई के लिए प्रति हैक्टर 8-10 कि.ग्रा. बीज दर की आवश्यकता होती है; जबकि सिंचित स्थितियों और संकरों के लिए प्रति हैक्टर 5 कि.ग्रा. बीज पर्याप्त होता है|

7.यदि मानसून आने में देरी हो और अन्य फसलों की बुआई में देर करनी पड़ी तो क्या हम उन फसलों के स्थान पर अण्डकी बुआई कर सकते हैं?

जीहां| शुष्क भूमि खेती में यदि मूंगफली, ज्वार आदि जैसी फसलों की बुआई करना संभव न होतो अरण्ड सर्वश्रेष्ठ 'विकल्प फसल' सिद्घ हो सकता है जिससे सूखा प्रवण क्षेत्रों में बारानी खेती को टिकाऊ बनाया जा सकता है| यह सूखा की अवधियों में कारगर साबित होता है तथा आर्थिक सुरक्षा के लिए इसे विकल्प के रूप में अपनाया जा सकता है|

8.  प्रतिकूल मौसम के अंतर्गत अरण्ड को वैकल्पिक फसल उगाने के क्या गुर हैं?

प्रतिकूल स्थितियों के अंतर्गत अरण्ड की अल्पावधि किस्मों जैसे ज्योति, क्रांति, जीसी-2 आदि को उगाने की सिफारिश की जाती है| बुआई के लिए 60 x30 सें.मी. का घना अंतराल रखा जाना चाहिए| तवादार हैरो से बार-बार मिट्टी पलट कर मृदा पलवार को सृजित किया जा सकता है जिससे वाष्पोत्सर्जन से होने वाली हानि कम हो जाती है और मिट्टी में नमी संरक्षित रहती है| एक वर्षा के पश्चात प्रति हैक्टर 20 कि.ग्रा. की दर से नाइट्रोजन का उपयोग करने पर उपज में वृद्घि होती है| नाजुक अवस्थाओं (50-75 दिनों पर)  में सीमित सिंचाई करने से लाभ होता है क्योंकि यह समय शूकी के विकास का होता है और इस प्रकार, उपज बढ़ जाती है| कमान क्षेत्रों में भी जब चावल की रोपाई नहीं की जा सकती है, अरण्ड की फसल को सीमित सिंचाइयों के साथ अगस्त-सितम्बर या अक्तूबर-जनवरी में उगाया जा सकता है|

9. उच्च उपज लेने के क्या गुर हैं?

अरण्ड की उत्पादकता सुधारने के लिए जिन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए, वे हैं: (i) अनुशंसित किस्म/संकर के गुणवत्तापूर्ण बीज का उपयोग; (ii) विशेष रूप से झुलसा के प्रकोप वाले क्षेत्रें में उचित फसल क्रम को अपनाना; (iii) मानसून आने के तत्काल बाद उपयुक्ततम समय पर बुआई करना; (iv) बुआई के पूर्व बीजों का कवकनाशी से उपचार; (v) अनुशंसित उर्वरकों का उपयोग; (vi) नाजुक अवस्थाओं में सुरक्षात्मक सिंचाइयां उपलब्ध कराना (vii) महत्वपूर्ण नाशकजीवों और रोगों का समेकित प्रबंध; (viii) कार्यिकी परिपक्वता पर फसल की कटाई; (ix) कम लागत वाली उत्पादन प्रौद्योगिकियों को अपनाना| इन विधियों से उत्पादन लागत में कमी आएगी तथा सिंचित और बारानी स्थितियों, दोनों में उपज व आय के अवसरों में वृद्घि होगी|

10. विभिन्न राज्यों में अरण्ड की उपयुक्त किस्में कौन-सी हैं और उनके क्या विशिष्ट गुण हैं?

बारानी क्षेत्रें में अल्प/मध्यम अवधि वाली किस्में उपयुक्त हैं: बारानी क्षेत्रें के लिए उपयुक्त किस्में हैं: आरसी 8, ज्वाला(48-1), ज्योति(डीसीएस9), टीएमवी5, टीएमवी6, क्रांति(पीसीएस4), एकेसी1, सीएच1, किरन, हरिता सिंचित क्षेत्रें के लिए जीसी-2 किस्म उपयुक्त है|

11. ऐरी रेशम कीट को पालने के लिए कौन-सी किस्में उपयुक्त हैं?

उपलब्ध प्राथमिक सूचना के अनुसार जीनप्ररूप जैसे48-1, डीसीएच177, डीसीएच32, जीसीएच4 तटवर्ती भारत के आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐरी रेशम कीटपालन के लिए उपयुक्त हैं|

12. अरण्ड को हानि पहुंचाने वाले महत्वपूर्ण कीटनाशकजीव कौन-से हैं

यद्यपि कीटों की 60 से अधिक ऐसी प्रजातियां हैं जो अरण्ड का आहार करती हैं लेकिन इनमें से लगभग आधा दर्जन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं| लाल रोमिल इल्ली, सेमीलूपर, स्पोडोप्टेरा लिटुरा,  पत्ती फुदका तथा फलीबेधक खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली अरण्ड के महत्वपूर्ण कीटनाशकजीव हैं|

13. अरण्ड के प्रमुखकीटनाशक जीव कब और किस प्रकार हानि पहुंचाते हैं?

लाल रोमिल इल्ली अंकुरण के दौरान तथा फसल बढ़वार की आरंभिक अवस्था  अर्थात् जून व जुलाई में सामान्यत: बारानी अरण्ड को संक्रमित करती है| अधिकांश हानि अप्रवासी इल्लियों से होती है जो खेतों में पुन: बुआई करने पर अक्सर अंडे देते रहते हैं| सेमीलूपर जुलाई-अगस्त में गंभीर हो जाता है तथा स्पोडोप्टेरा अगस्त-अक्तूबर में गंभीर आक्रमण करता है| ये दोनों कीट पत्तियों का आहार करते हैं और फसल को पत्ताहीन कर देते हैं| ठंडे महीनों में पत्ती फुदका सक्रिय हो जाता है और पौधों से रस चूस लेता है| फली बेधक का आक्रमण पुष्पन अवस्था से आरंभ होता है और फसल की कटाई तक चलता रहता है|

14. वे कौन से रोग हैं जो बीज के माध्यम से होते हैं?

बीज के माध्मय से होने वाले रोग हैं:  आल्टरनेरिया झुलसा, जीवाण्विक पत्ती झुलसा, फ्यूजेरियम मुरझान तथा बोट्राइटिस धूसर सड़न|

15. अंकुरण तथा पौद अवस्था में सामान्यत: कौन-सा रोग होता है?

फाइटोफ्रथोरा पैरासाइटिका  द्वारा अंकुरणशील बीज में पौद का झुलसा होता है जो बीज पत्रों व पौधे के वृद्घिशील भागों को प्रभावित करता है जिससे पौधा खड़ा नहीं रह पाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है|

16. अरण्ड के तेल के सामान्यत: क्या उपयोग हैं?

अरण्ड के तेल को काफी समय से प्रकाश तथा स्नेहक तेल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है| चूंकि यह तेल अन्य तेलों की तुलना में 16 गुना श्यानताशील होता है अत: इसको सर्वश्रेष्ठ स्नेहक या चिकनाई लाने वाला माना जाता है| अरण्ड का तेल उच्च तथा निम्न तापमानों पर तरल बना रहता है अत: सक्रियताकारक स्नेहक के रूप में इसका महत्व काफी बढ़ गया है| इसका हाइड्रोक्सी समूह आंतों में प्रतिक्रिया करता है और इस प्रकार यह विरेचक या कब्ज दूर करने का काम भी करता है| यह बालों में लगाने और शरीर की मालिश करने के लिए भी बहुत अच्छा तेल है| अरण्ड के तेल को किसी भी अन्य तेल के समान साबुन बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है| यह तेल घरों व बाजारों में अनाजों के परिरक्षक के रूप में भी कार्य करता है|

17. क्या अरण्ड को बायोडीजल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है?

अरण्ड का तेल अत्यंत श्यान या चिकनाई वाला होता है| इसे आंतरिक दहन इंजनों में कुहासे के रूप में छिड़कना कठिन है| बायोडीजल के रूप में इसके उपयोग न हो पाने का एक कारण इसकी उच्च कीमत है| तथापि, जब अरण्ड को निर्जलीकृत कर लिया जाता है तो उत्पाद निर्जलीकृत अरण्ड तेल कहलाता है जिसे जैव ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है क्योंकि तब इसकी श्यानता अन्य वानस्पतिक तेलों के समान हो जाती है| एक अन्य तरीका जिससे अरण्ड के तेल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है यह कि तेल को इसके मिथाइल इस्टरों में हस्तांतरित करते हुए डीजल के स्थान पर इस्तेमाल किया जाए| मेथाइल ईस्टर जैव ईंधन के रूप में अधिक कारगर हैं| अरण्ड के तेल तथा इसके उत्पादों की उच्च लागत इसे जैव इंर्धन के रूप में इस्तेमाल करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है|

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सूरजमुखी

1. सूरजमुखी सूर्य की ओर क्यों रहताहै?

जब सूरजमुखी का पौधा कली से पुष्पन अवस्था में होता है तो यह प्रतिदिन सूर्य की गति के साथ-साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में घूमता रहता है| हार्मोनी प्रभाव (ऑक्सिन) के कारण ऐसा होता है जबकि पुष्पन अवस्था में ऑक्सिन शीर्ष क्षेत्र के निकट एकत्रित हो जाता है| जब पौधा सूरज का सामना करता है तो पौधे के छायादार क्षेत्र में ऑक्सिन की सांद्रता बढ़ जाती है जिससे उस क्षेत्र की कोशिकाएं लंबी हो जाती हैं और पौधे की उसी स्थिति में तने में विभेदनशील लंबाई आ जाती है| लंबी कोशिकाएं ऊपरी शीर्ष को धक्का देती हैं जिससे वे सूर्य के सामने की विपरीत दिशा में झुक जाते हैं| यह क्रिया चालू रहती है और इसके कारण सूरजमुखी का पौधा सूर्य की पूर्व से पश्चिम की ओर गति के साथ झुकता रहता है| एक बार जब पुष्पन पूरा हो जाता है तब ऑक्सिन का उत्पादन कम हो जाता है और सूरजमुखी का पौधा पूर्व दिशा में ही बना रहता है|

2. सूरजमुखी के फसल के क्या विशेष गुण हैं?

  • सूरजमुखी के फसल के विशेष गुण हैं:
  • अल्पावधि (90-110 दिन)
  • उच्च बीज और तेल उपज
  • सभी मौसमों में खेती के लिए उपयुक्त
  • सभी प्रकार की मिटि्रटयों में उगाई जा सकती है
  • क्षेत्र की अनेक फसलों के साथ आदर्श अंतर फसल के रूप में उगाई जा सकती है
  • अल्प वृद्घि वाले मौसमों में यह 'कैच फसल' हो सकती है
  • विभिन्न स्थितियों के अंतर्गत आकस्मिक फसल के रूप में भी बहुत उपयुक्त है
  • उच्च बीज प्रगुणन अनुपात(> 1:80)
  • गैर शाखित निर्धारित आकार के पौधे जो यांत्रिक कटाई के लिए उपयुक्त होते हैं
  • सूरजमुखी को मूंगफली, कपास, मक्का, आलू, दलहनों और चावल की फसल के साथ पूर्ववर्ती या परवर्ती फसल के रूप में उपयोगी फसल क्रमों में उगाया जा सकता है|

3. सूरजमुखी की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मौसम कौन सा है?

सुरजमुखी अपेक्षाकृत प्रकाश व ताप असंवेदी पौधा है| हमारे देश में यह सभी मौसमों में उगाया जा सकता है| तथापि, किसी स्थान पर बुआई का आदर्श समय इस आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए कि फसल की पुष्पन अवधि अत्यधिक गर्म व शुष्क मौसम (>380 से.) या निरंतर वर्षा/बूंदा-बांदी की अवधि के साथ न आए क्योंकि ऐसा होने पर बीज कम उपजते हैं|

4. भारत के विभिन्न क्षेत्रें में सूरजमुखी की बुआई का अनुशंसित समय कौन सा है?

परंपरागत क्षेत्रें में खरीफ (वर्षाऋतु) के लिए हल्की मिटि्टयों में जून के दूसरे पखवाड़े से मध्य जुलाई का समय तथा भारी मिटि्टयों में अगस्त के दूसरे पखवाड़े तक का समय उपयुक्त है| रबी (शरदऋतु) के लिए फसल को सितम्बर से अक्तूबर के पहले पखवाड़े तक बो या जा सकता है| गंगा यमुना के उत्तर भारत के मैदानों में वसंत ऋतु की फसल के रूप में इसकी बुआई जनवरी से ले कर फरवरी के दूसरे पखवाड़े तक की जा सकती है|

5. सूरजमुखी की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ मिटि्टयां कौन-सी हैं?

सूरजमुखी को सभी प्रकार की मिटि्रटयों नामत: लाल, काली और जलोढ़ मिटि्टयों में उगाया जा सकता है| यह गहरी, अच्छी जलनिकासी वाली व उपजाऊ मिटि्टयों में सबसे अच्छी उगती है| जल भराव वाले क्षेत्रों में इसकी खेती से बचना चाहिए| आदर्श pH लगभग 6.5-8.0 है| यह हल्की क्षारीय दशाओं को सह सकती है लेकिन अम्लता को नहीं| सूरजमुखी लवणता के हल्के स्तर को सह सकती है|

6. एक हैक्टर क्षेत्र में रोपाई के लिए कितने बीज की आवश्यकता होती है?

एकहैक्टर (10000 वर्गमी.) क्षेत्र के लिए उपयुक्ततम पौधा संख्या 55555 है जिसका अंतराल 60 सें.मी. x 30 सें.मी. होना चाहिए| बीज सूचकांक को ध्यान में रखते हुए (प्रति100 बीजों का भार) अधिकांश किस्में और संकर अंकुरण में भिन्नता दर्शाते हैं, अत: प्रति स्थान में 2-3 बीजों को बोने के लिए प्रति हैक्टर 5 कि.ग्रा. बीज दर अपनाने की सिफारिश की जाती है| परिशुद्घ रोपाई तथा उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की अवस्था में बीज दर को घटाकर प्रति हैक्टर 3-4 कि.ग्रा. किया जा सकता है|

7. सूरजमुखी की रोपाई कैसे की जाती है?

सूरजमुखी को इसके बीजों को मिट्टी में सीधे बोकर रोपा जा सकता है| जब एक बार खेत की मिट्टी भुरभुरी बना ली जाए तो 60 सें.मी. के अंतराल पर कूंड़ें बनानी चाहिए तथा कूंड़ों में 30 सें.मी. के अंतराल पर प्रत्येक स्थान पर 1 या 2 बीज मिट्रटी में दबा देने चाहिए(हाथ से रख कर) | बुआई की यांत्रिक युक्तियां जैसे बीज ड्रिल, बीज व उर्वरक ड्रिल परिशुद्घ प्लांटर भी उपलब्ध हैं| बुआई की गहराई 2-3 इंच होनी चाहिए| मिट्टी को ढकते हुए उसे गीला कर देना चाहिए ताकि बीज और मिट्टी का उचित सम्पर्क बना रहे|

8. सूरजमुखी की खेती के लिए कौन से सूक्ष्म पोषक तत्व अनिवार्य हैं?

सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों (जस्ता, तांबा, लौह, मैग्नीज़, बोरान, मोलिब्डेनम, क्लोराइड) में से बोरॉन, सूरजमुखी के लिए सब से अधिक महत्वपूर्ण है| इसके अलावा मृदा परीक्षण रिपोर्टों के आधार पर मिट्टी में जिस सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी पाई जाए, उसका उपयोग किया जाना चाहिए| सामान्यत: मिट्टी में जस्ते की कमी पाई जाती है जिसे प्रति हैक्टर 5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट का उपयोग करके दूर किया जा सकता है|

9. सूरजमुखी में खरपतवारों को किस प्रकार नियंत्रित करना चाहिए?

सूरजमुखी में खरपतवारों के नियंत्र्ण के लिए दो निराई-गुड़ाई करनी चाहिए| पहली निराई-गुड़ाई हाथ से जो बुआई के 15-20 दिन बाद की जानी चाहिए तथा दूसरी इसके15 दिन बाद| विकल्प के रूप में 600 लिटर जल में अंकुरण के पूर्व प्रति हैक्टर1.5 कि.ग्रा. की दर से एलाक्लोर या पेंडीमेथाइलिन या फ्लूक्लोरालिन को घोलकर बुआई के बाद उसी शाम को छिड़कना चाहिए अथवा खरपतवारों के प्रभावी नियंत्र्ण के लिए बुआई के 35 दिन बाद हाथ से खरपतवार निकालते हुए निराई-गुड़ाई करनी चाहिए|

10. जब पानी की उपलब्धता सीमित हो तो सुरजमुखी की फसल की किस अवस्था में सिंचाई की जानी चाहिए?

जब पानी की उपलब्धता सीमित हो तब फसल की नाजुक अवस्थाओं में सिंचाई की जानी चाहिए, ताकि उच्च उपज ली जासके| नाजुक अवस्थाओं में नमी की कमी से बचना चाहिए| सूरजमुखी में सिंचाई की नाजुक अवस्थाएं कलिका खिलने, पुष्प खिलने तथा बीज भरने वाली अवस्थाएं हैं| नाजुक फसल वृद्घि की अवस्थाओं का निर्धारण रोपाई के बाद के दिनों के अनुसार किया जा सकता है जो निम्नानुसारहै:

रोपाई के बाद के दिन    अल्पावधि किस्में        दीर्घावधि किस्में

कलिका निकलना              30-35               35-40

पुष्प का खिलना               45-50               55-65

बीज भरना                      55-80               65-90

 

11. सूरजमुखी के शीर्षो से बीजों को किस प्रकार अलग किया जाना चाहिए?

सूरजमुखी में गहाई सामान्यत: शीर्षों के सूखने के 2-3 दिन बाद की जानी चाहिए, ताकि बीज शीर्ष से आसानी से अलग हो जाएं|  गहाई शीर्षों को डंडों से पीटते हुए या मनुष्य द्वारा चलाए जाने वाले गहाई यंत्रें से या शीर्षों को रगड़कर की जाती है| शक्ति से चलने वाले यांत्रिक गहाई उपकरण भी उपलब्ध हैं जिन्हें गांव में किराए पर लेकर इस्तेमाल किया जा सकता है|

12. सूरजमुखी के प्रमुख कीटनाशकजीव कौन-कौन से हैं?

चूंकि यह फसल देश के किसी भी भाग में किसी भी समय उगाई जा सकती है इसलिए इस फसल के कीट नाशक जीव समय व स्थान के अनुसार अलग-अलग हैं:

खरीफ में बोई गई फसल के प्रमुख नाशक जीव हैं: थि्रप्स, सफेद मक्खियां तथा पत्ती फुदके जो चूषक नाशीजीव हैं जबकिस्पोडोप्टेरा लिटुरा और हरा सेमीलूपर, ट्राइकोप्लूसिया प्रजाति पत्तियों को खाने वाले हैं और हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा कैपिटुलम बेधक हैं| अक्सर कैपिटुलम बेधक फूल की अंखुडि़यों और पंखुडि़यों को भी खा लेते हैं|

रबी मौसम में दक्षिण भारत में पत्ती फुदका प्रमुख नाशीजीव है जबकि थि्रप्स तथा सफेद मक्खियां गौण कीट हैं|

उत्तर भारत में यह फसल वसंत के मौसम में उगाई जाती हैं जहां कटुआ कृमि पौद अवस्था का प्रमुख नाशी जीव है, जबकि पत्ती फुदका, हरा सेमीलूपर और कैपिटुलम बेधक अन्य प्रमुख नाशीजीव हैं|

13. कीटनाशीजीव सूरमुखी की फसल को किस प्रकार हानि पहुंचाते हैं?

मिट्रटी तथा पौद के कीटनाशी जीव जैसे दीमकें और कटुआ कृमि जड़ों व पौदों को प्रभावित करते हैं|

पौधे को पत्ती विहीन करने वाले तथा रस चूसने वाले कीट नाशक जीव पत्ती के प्रकाश संश्लेषी क्षेत्र को प्रभावित करते हैं और इससे पौधे के खाद्य भंडार को क्षति होती है|

कैपिटुल मबेधक पौधे के पुष्पीय भागों, डिम्बाशयों को नष्ट करता है; यह विकासशील बीजों में भी पनपता है और इस प्रकार बीज की उपज कम हो जाती है|

कीटनाशक जीवों के कारण पौधों के क्षतिग्रस्त भागों के माध्यम से अनेक रोग पनपते हैं जिनसे फसल प्रभावित होती है|

14. क्या सूरजमुखी की फसल से मधुमक्खी पालन में भी सहायता मिल सकती है?

सूरजमुखी मधुमक्खियों के लिए रस तथा पराग का एक अच्छा स्रोत है और इससे उपयोगी शहद की प्राप्ति बढ़ जाती है| शहद मिलने के अलावा मधुमक्खियों के क्रियाकलापों से सूरजमुखी की बीज उपज मे भी परागण बढ़ जाने के कारण अधिक बीज लगने, बीज का भार बढने और तेल अंश बढ़ने से 20-30 प्रतिशत की वृद्घि होती है| प्रति हैक्टर मधुमक्खी के 5 छत्ते उपयुक्ततम पाए गए हैं| मधुमक्खी पालन से लोगों को अतिरिक्त रोजगार मिलता है और सूरजमुखी की फसल के साथ-साथ अतिरिक्त आय भी होती है| पुष्पन अवस्था के दौरान कीटनाशियों के छिड़काव से बचने की सावधानी बरती जानी चाहिए|

15. हाल के वर्षों में सूरजमुखी की खेती के लिए कौन - रोग प्रमुखखतरा बन गया है तथा इस रोग के क्या लक्षण व कारक एजेंटहैं?

सूरजमुखी का ऊतक क्षय रोग आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रोग है और हाल के वर्षों में यह सूरजमुखी की खेती के लिए एक प्रमुख खतरा बन गया है| यह रोग फसल वृद्घि की सभी अवस्थाओं में दिखाई देता है| इसके प्रमुख लक्षण हैं- चित्तियां पड़ना, पौधे का मुरझाना और पत्तियों में अचानक ऊतक क्षय होना, पर्णवृंत पर काली धारियां पड़ना, तने का ऐंठना और पुष्पीय भागों पर संक्रमण का फैल जाना| यदि संक्रमण फसल की आरंभिक अवस्थाओं में है तो पौधों की बढ़वार रूक जाती है, वे निर्बल हो जाते हैं और पुष्पन के पूर्व मर जाते हैं| पछेतीसंक्रमित पौधों में केवल पौधों के शीर्ष विरोपित हो जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप या तो बीज बिल्कुल नहीं लगते हैं या बीज बहुत कम लगते हैं| तम्बाकू का धारीदार विषाणु ऊतक क्षय रोग उत्पन्न करता है|

16. बीजों को इनके उपयोग के लिए कितने समय तक भंडारित किया जा सकता है?

सामान्य स्थितियों में बीज कटाई के एक वर्ष बाद तक सजीव रहते हैं और अच्छा अंकुरण देते हैं| अत: यह सलाह दी जाती है कि अच्छा अंकुरण लेने के लिए बीज को एक वर्ष के पहले इस्तेमाल कर लिया जाए|

17. सूरजमुखी का तेल कितना मूल्यवान है?

सूरजमुखी के तेल को अन्य खाद्य तेलों की तुलना में इसकी उच्च गुणवत्ता व पोषक गुणों के कारण अधिक पसंद किया जाता है| सूरजमुखी के तेल में कम मात्र में पॉली व मोनेा असंतृप्त वसा अम्ल होते हैं और इसमें 15 प्रतिशत से कम संतृप्त वसा अम्ल होते हैं| अनिवार्य वसा अम्ल के उच्च अनुपात को रक्त में कोलेस्ट्राल को कम करने का कारण माना जाता है इसलिए सूरजमुखी का विशेष महत्व है| सूरजमुखी का तेल असंतृप्त वसा अम्लों का समृद्घ स्रोत है| इसमें 80 प्रतिशत ओलेइक अम्ल भी मौजूद होता है| इसमें अधिक आक्सीकारक स्थिरता होती है अत: यह अल्पाहार तैयार करने में तलने के तेल के रूप में बहुत उपयोगी है| सूरजमुखी के तेल को कुछ हद तक औषधियों, सौंदर्य प्रसाधनों, वनस्पति, पेंट और स्नेहकों के औद्योगिक निर्माण में भी इस्तेमाल किया जाता है|

18. तेल निकाल ने के बाद इसकी खली कितनी उपयोगी है?

वसाहीन चूर्ण या खली का उपयोग खाद्य संरूपों के रूप में किया जाता है| सूरजमुखी का प्रोटीन लाइसीन को छोड़ कर अन्य सभी एमिनो अम्लों के मामले में संतुलित है| सूरजमुखी जल में घुलनशील बीकॉम्प्लैक्स विटामिनों का भी अच्छा स्रोत है|

19. सूरजमुखी के अन्य क्या उपयोग हैं?

सूरजमुखी को तिलहनी फसल के रूप में उगाने के अलावा इसे कुछ विकसित देशों में पशुओं के लिए साइलेज तैयार करने के लिए भी उगाया जाता है| गैर-तिलहनी सूरजमुखी को उगाने का एक कारण इससे तैयार होने वाला अल्पाहार है जो विकासशील देशों में बहुत लोक पि्रय है| सूरजमुखी की चिडि़यों के आहार के रूप में भी मांग बढ़ रही है क्योंकि बहुत से पक्षी इसे खाना पसंद करते हैं| सूरजमुखी की कुछ प्रजातियां शोभाकारी फसलों, रंजकों/रंगों के स्रोत के रूप में भी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं| उच्च मूल्य वाले अन्य उत्पाद हैं सनबटर, बायोडीजल, सूरजमुखी का मोम, सूरमुखी का चोकर, सूरजमुखी स्क्रिनिंग आदि| हेलियंथस ट्यूबरोसससे शर्करा से समृद्घ कंद मिलते हैं और इनसे एल्कोहॉल प्राप्त किया जा सकता है| सूरजमुखी के पौधे के पिथ से रबड भी तैयार की जा सकती है|

 

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कुसुम

1. क्या हम कुसुम की फसल को जब खरीफ के मौसम में सामान्य से कम वर्षा होती है, रबी की फसल में आकस्मिक फसल के रूप में उगा सकते हैं?

जीहां| यह कम वर्षा या सामान्य से कम वर्षा वाली स्थितियों में भी एक लाभदायक वैकल्पिक या आकस्मिक फसल सिद्घ होती है |  यह किसी भी अवस्था में अधिक वर्षा या आर्द्रता को नहीं सह सकती है क्योंकि ऐसी अवस्था में कवक रोगों से इसकी वृद्घि को बहुत क्षति पहुंचती है|

2. क्या हम किसी किस्म के बीज एकत्र कर सकते हैं?

बीजों को अगले मौसम में उपयोग में लाने हेतु किसी भी किस्म से लिया जा सकता है लेकिन यह सिफारिश की जाती है कि प्रत्येक 3 से 4 वर्ष बाद किस्म को बदल देना चाहिए|

3. कुसुम की खेती के लिए आदर्श जलवायु क्या है?

कुसुम की फसल व्यापक प्रकार के जलवायु की स्थितियों में उगाई जा सकती है| भारत में यह फसल अधिकांशत: 14 और 220 उत्तर तथा 73.5 व 790 पूर्व में शरद ऋतु (सितम्बर / अक्तूबर से मार्च / अप्रैल तक) उगाई जा सकती है| कुल मिलाकर यह दिवस- उदासीन फसल है, लेकिन ताप के प्रति संवेदनशील है| यह अत्यधिक ठंड या अत्यधिक गर्मी को नहीं सह सकती है| यह फसल पौद तथा वानस्पतिक बढ़वार की अवस्थाओं में कम तापमान(< 150 से.) की सहिष्णु है लेकिन पौधों के लंबे होने, पुष्पन और पश्च पुष्पन अवस्थाओं में कम तापमान के प्रति संवेदी है| यह अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रें में बेहतर उगती है| यह फसल बढ़वार की किसी भी अवस्था में अत्यधिक वर्षा या आर्द्रता को नहीं सह सकती है क्योंकि ऐसी अवस्था में इसे कवकीय रोगों से क्षति होती है| पुष्पन अवस्था में जल्दी-जल्दी और लंबे समय तक वर्षा का होना और अधिक ओस पड़ना परागण तथा बीज के विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है|

4. कुसुम की खेती के लिए किस प्रकार की मिटि्टयां उपयुक्त हैं?

कुसुम के लिए मध्यम से उच्च उर्वर, पर्याप्त गहरी, नमी को बनाए रखने वाली व अच्छी जलनिकासी वाली ऐसी मिटि्रटयों की आवश्यकता होती है जिनका pH उदासीन हो| वर्तमान में इसकी वाणिज्यिक खेती तटवर्ती भारत में मध्यम तथा गहरी काली मिट्टी वाले क्षेत्रें तक ही सीमित है| तथापि, यह फसल कुछ अन्य मिटि्टयों जैसे बलुआ दुमट, मृत्तिकादुमट तथा जलोढ़ में भी समान रूप से अच्छी उगती है|

5. एक हैक्टर खेत में बुआई के लिए कितने बीज की जरूरत होती है?

जब कुसुम को खरीफ परती के बाद उगाया जाता है तो प्रति हैक्टर 7.5 से10 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है| तथापि जब इस फसल को अल्पकालीन अनाजों व दलहनी फसलों के बाद क्रम फसलों के रूप में उगाया जाता है तो पौधों की संतोषजनक संख्या बनाए रखने के लिए10 से15 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है|

6. कुसुम के लिए उपयुक्ततम अंतराल क्या है?

45 x20 सें.मी. पौधा अंतराल रखने की सिफारिश की जाती है| सिंचित स्थितियों के अंतर्गत 60 सें.मी. का कतार अंतराल रखा जा सकता है| चूंकि इस फसल के पौधे अच्छे शाखित होते हैं इसलिए अंतराल में कुछ बदलाव भी लाया जा सकता है|

7. यदि पानी सीमित हो तो उसे किस अवस्था में दिया जाना चाहिए?

फसल में पौधों की अगेती बढ़वार या पुष्पन अवस्था में एक जीवन रक्षक सिंचाई की जानी चाहिए या जब मिट्रटी में नमी फसल बढ़वार के लिए बहुत कम हो जाए, तब सिंचाई कीजानी चाहिए|

8. मिट्रटी में नमी को संरक्षित करने के लिए क्या किसी प्रकार की निराई-गुड़ाई की आवश्यकता है?

काली मिटि्रटयों में दिसम्बर व उसके बाद से दरारें दिखाई पड़ने लगती हैं| इन दरारों में देरी लाने के लिए उन्हें आरंभ होते ही ऊपर से बुरादा डालकर भर देना चाहिए और इस प्रकार, नमी की हानि को कम से कम रखना चाहिए| बैलों से चलने वाली हो/हैरो/स्वीप का उपयोग करके दिसम्बर में इससे पहले की फसल का वितान बंद हो जाए और शूकियां समस्या पैदा करने लगे, एक अतिरिक्त निराई-गुड़ाई करनी चाहिए या फसल में हो का उपयेाग करना चाहिए|

9. कुसुम की फसल की कटाई किस प्रकार की जानी चाहिए?

पौधों को उनके आधार के पास हंसिये से काटना चाहिए या जब कभी संभव होतो पौधों को उखाड़ते हुए उन्हें छोटे व भली प्रकार दबाये गए गट्रठरों के रूप में तब तक खेतों में रखना चाहिए जब तक वे पूरी तरह सूख न जाएं| गेहं में इस्तेमाल होने वाले कम्बाइन हार्वेस्टरों का उपयोग कुसुम की फसल की कटाई के लिए भी किया जा सकता है|

10. फसल की गहाई किस प्रकार करनी चाहिए?

  • गहाई स्थल तक आसानी से साज-संभाल व परिवहन के लिए पौधों को उनके कटे हुए छोरों को विपरीत दिशा में रखते हुए ढेरों में व्यवस्थित किया जाना चाहिए और उनके शाखित तथा कांटेदार भागों को दूर रखना चाहिए|
  • यदि आवश्यक हो तो पैरों व हाथों को फसल के कांटों से बचाने के लिए हाथों में बोरों के दस्ताने पहनते हुए उन्नत हंसिये से कटाई की जानी चाहिए|
  • गहाई पौधेां को डंडे से पीटकर या पत्थर के रोलरों को पैरों से खींचते हुए अथवा ट्रैक्टर के द्वारा की जानी चाहिए और बाद में बीजों को साफ करने के लिए सामग्री को पछोरना चाहिए|
  • गहाई तथा सफाई संबंधी कार्य शक्ति से चलने वाले उन थ्रेशरों की सहायता से भी किए जा सकते हैं जो गेहूं जैसी अन्य फसलों की गहाई के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं|

10. वर्षा आने में देरी होने पर प्रबंध संबंधी किन विधियों को अपनाया जाना चाहिए?

  • अक्तूबर / नवम्बर में जब पछेती वर्षा हो तो कुसुम की फसल उगाना अधिक लाभदायक होता है|
  • एकल फसल वाले रबी क्षेत्रें में लंबे समय तक शुष्क मौसम रहने पर रोपाई के तत्काल बाद यदि पौद निकलते समय पर्याप्त नमी न हो तो पौधों का अंकुरण कमजोर होता है, पौधे कम उगते हैं और/अथवा अगेती बोई गई रबी फसलें पूरी तरह असफल हो जाती हैं| ऐसे मामलों में अगेती बोई गई रबी की फसल को उखाड़कर कुसुम की दुबारा बुवाई की जानी चाहिए, ताकि अक्तूबर/नवम्बर के आरंभ में होने वाली अनुकूल वर्षा का लाभ उठाया जास के|

11. जब मानसून लंबे समय तक बना रहे तो कौन सी प्रबंधन विधियां अपनाई जानी चाहिए?

  • जब भी खरीफ की फसलों की कटाई के बाद सितम्बर के अंत में/अक्तूबर में अनुकुल वर्षा हो तो दूसरी फसल के लिए मिट्रटी में मौजूद पर्याप्त नमी का लाभ उठाया जाना चाहिए और खरीफ की अनाज वाली, फलियों वाली व अन्य फसलों की कटाई के तत्काल बाद कुसुम की फसल रोप दी जानी चाहिए|
  • सूरजमुखी की खेती वाले महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि जैसे क्षेत्रें में जहां की मिट्टी हल्की व मध्यम बनावट वाली है और जहां खरीफ में सामान्यत: अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं वहां खरीफ फसलों की कटाई के बाद आकस्मिक फसल के रूप में कुसुम की फसल उगाई जा सकती है| ऐसा रबी में मौजूद मौसम की सामान्य स्थितियों के अंतर्गत किया जा सकता है|
  • यदि रोपाई में देरी होती है और/अथवा मिट्टी की गहराई सीमित होती है तो कुसुम की अतिरिक्त वानस्पतिक वृद्घि को रोकने के लिए सामान्य की तुलना में उच्चतर बीज दर रखी जानी चाहिए|

12. कुसुम के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण नाशकजीव कौन से हैं?

पूरे विश्व में रिकॉर्ड की गई कीटों, कुटकियों और सूत्रकृमियों 80 प्रजातियों में से तथा भारत में कीटनाशक जीवों की 25 प्रजातियों में सेमाहू (यूरोलेकन कार्थेनीकुसुम की फसल का सबसे अधिक विनाशक व खतरनाक कीट है| आर्थिक महत्व के अन्य कीटनाशक जीव हैं: कुसुम की इल्ली (पेरिगेई कैपेन्सिस),चने का फली बेधक (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा), खोल / फलमक्खी(एकेंथियोफिलस हेलिएंथी), सेमीलूपर(प्लूसियाप्रजाति) तथा गुझिया घुन(टेनिमेकस इंडिकस) |

13. क्या मुरझान रोग की कोई प्रतिरोधी /सहिष्णु किस्म है?

जी हां| संकर डीएसएच- 129, एनएआरआई- एनएच-6 तथा किस्में ए1, एचयूएस- 305, परभणी कुसुम और एनएआरआई 6 मुरझान की प्रतिरोधी हैं|

14.कौन से रोग हैं जिन्हें फसल क्रम द्वारा नियंत्रित किया जा सकता हैफसल क्रम में कौन सी फसलें उगाई जा सकती हैं?

मुरझान तथा जड़ सड़न रोगों को फसल क्रम द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है| क्रम के लिए चना, गेहूं या रबी ज्वार को उगाया जा सकता है| ऐसी स्थिति में 2 या 3 वर्ष तक फसल क्रम अपनाना चाहिए|

15. कांटेदार या गैर-कांटेदार किस्मों में रोगों के लगने के मामले में क्या कोई भेद है?

गैर-कांटेदार किस्म में संभवत: उनकी लंबी अवधि के कारण पत्ती धब्बा रोगों के प्रति कम संवेदनशील होती हैं जबकि रोग विकास के लिए अनुकूल अवधि में भी यह फसल रोग से बच जाती है|

16. कुसुम के तेल के क्या सामान्य उपयोग हैं?

कुसुम का तेल एक मूल्यवान खाद्य तेल है जो बहु असंतृप्त वसा अम्लों से समृद्घ होता है (लेनोलेइक अम्ल 78 प्रतिशत) |यह रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्र को कम करने में प्रभावी भूमिका निभाता है तथा इसे एक स्वस्थ खाना पकाने वाला तेल माना गया है| इसे शिशुओं के आहार तथा तरल पोषणिक आहारों में इस्तेमाल किया जाता है| इसे हिमीकृत मिष्ठानों में भी इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इस में कम तापमान पर उच्च स्थिरता का गुण मौजूद होता है|

17. कुसुम के पूरे पौधों का उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है?

कुसुम की पत्तियों से तैयार की गई चाय का उपयोग करके महिलाओं में गर्भपात व बांझपन से बचा जा सकता है| पत्तियों तथा प्ररोहों का उपयेाग पत्तीदार सब्जी के रूप में किया जाता है| ये विटामिनए, लौह, फास्फोरस और कैल्सियम से समृद्घ होती हैं| कुसुम के मुलायम पौधों को पशु खाते हैं तथा इन्हें सुखा कर या इनका साइलेज अथवा अचार बनाकर भंडारित भी किया जा सकता है| कुसुम के डंठलों में सेल्यूलोज की अधिक मात्र होती है, अत: इन्हें क्रॉफ्रट पेपर, पार्टिकल बोर्ड आदि बनाने के लिए बोर्ड उद्योग में अथवा लुगदी के लिए लिग्नोसैल्यूलोजिक सामग्री के वैकल्पिक स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है| डंठलों को ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है| कुसुम को अन्य फसलों को आवारा पशुओं से बचाने के लिए खेत की मेड़ों पर/बाड़ फसल के रूप में भी बोया जा सकता है|

18. कुसुम की पंखुडि़यों के क्या औषधीय व अन्य उपयोग हैं?

कुसुम की पंखडि़यों का उपयोग धमनियों को खोलने, रक्त चाप को कम करने व रक्त का प्रवाह बढ़ाने में किया जा सकता है क्योंकि इससे ऊतकों को अधिक ऑक्सीजन मिलती है| कुसुम से तैयार की गई नेत्र की औषधियों से विशेष रूप से बच्चों में दृष्टि दोष को कम किया जा सकता है| इसके फूलों को रात भर भिगोकर गीला लगाने से एलर्जी से होने वाले चकत्ते कम हो जाते हैं| कुसुम के छिलकों को नपुसंकता के उपचार तथा शुक्राणुओं की अधिक मृत्यु होने वाले रोगों के उपचार में किया जा सकता है|